इतिहास के झरोखे से - दी गंगानगर केन्द्रीय सहकारी बैंक लि. श्रीगंगानगर
सन् 1927 मे जब तत्कालीन बीकानेर स्टेट के शासक महाराजा श्री गंगा सिंह के सतत् प्रयासो से गंगनहर का श्रीगंगानगर जिले मे प्रवेश हुआ, जिले का किसान खुशी से नाच उठा। उसके हदय मे अपनी जमीन के प्रति श्रद्वा और प्यार अत्यधिक बढ़ गया। प्रत्येक कृषक यह सोचने लगा कि अब उसकी धरती सोना उगलने लगेगी। वास्तव मे हुआ भी ऐसा ही। जल की प्रचूर मात्रा मे गंगानगर जिले की मरूस्थल भूमि को लहराती खेती मे परिवर्तित करना तो प्रारंभ कर दिया परन्तु भूमि को संवारने और उसको उपजाऊ बनाने के लिए एक सबसे बडी कठिनाई जो उसके समक्ष आई वह थी-ूपंजी की कमी और आर्थिक सहायता का अभाव। सुअवसर देख वर्णिक वर्ग ने काश्तकारों को ऋण देना तो प्रारंभ कर दिया परन्तु बहुत कम मात्रा मे तथा बहुत ऊंची ब्याज की दरोेें पर। उस समय कोई दूसरी ऐसी वित्तीय संस्था दृष्टिगोचर नही हो रही थी जो किसानो की अर्थ सम्बन्धी कठिनाई को दूर कर सके।

उपरोक्त परिस्थितियों को दृष्टिगोचर रखते हुए, क्षेत्र का हित चाहने वाले एवं किसानो की दुविधा दूर करने की अभिलाषा रखने वाले कुछ महानुभावो ने मिल बैंठ इस समस्या पर गंभीरता पूर्वक विचार विमर्श किया। परिणामस्वरूप बीकानेर सरकार के सहयोग से सन् 1930 मे बीकानेर स्टेट एक्ट -थर्ड 1920 के अन्तर्गत दी सैंट्रल कॉ-ऑपरेटिव मार्टगेज बैंक लिमिटेड, श्रीगंगानगर के नाम से इस बैंक की स्थापना की गई। जिन महानुभावों ने बैंक की स्थापना तथा उसके पश्चात् इसको पनपने के लिए प्रयास किये वे थे:

  1. श्री जयगोपाल पुरी - तत्कालीन रेवेन्यु कमीशनर
  2. श्री इन्द्रभान तनीज - तत्कालीन सहायक रेवेन्यु कमीशनर
  3. श्री इसरदास - तत्कालीन अफसर माल
  4. श्री अमरनाथ - तत्कालीन तहसीलदार
  5. श्री जोशी जगतनाथ - तत्कालीन तहसीलदार
  6. श्री भगवान दास - तत्कालीन तहसीलदार
  7. श्री बाबू राम - तत्कालीन तहसीलदार
  8. बाबा मवेशीनाथ जी - निवासी श्रीगंगानगर
  9. श्री रतीराम जी - गुमजाल
  10. सेठ सोहन लाल - श्रीगंगानगर
  11. श्री मोहन सिंह - मोहनपुरा
  12. श्री बुटामल - कोठा
  13. श्री कुतुबहीन - मौला
  14. श्री कर्मचन्द कुक्कड - श्रीगंगानगर
उपरोक्त महानुभावो मे से नॉन ऑफिशियल व्यक्तियो ने बैक के हिस्से स्वयं खरीदे एवं अन्य लोगो को भी हिस्से खरीदने के लिए प्रेरित किया। उन्होने ने स्थान-स्थान पर भ्रमण करके बैंक की स्थिति सुदृढ़ करने के लिए भरसक प्रयत्न किये। इतना ही नही वे बैंक के संचालन मे भी आगे आये और बैंक की व्यवस्था का कार्यभार भी अपने कंधो पर लिया।

श्री दोलत राम सैनी एक ही ऐसे व्यक्ति थे जो सहकारी विभाग की तरफ से निरीक्षक नियुक्त किये गये थे। इन्होने अपने कार्य के साथ-साथ बैंक के मैनेजर पद पर भी कार्य किया और अपने और अपने प्रभाव से बैंक के जितने सदस्य बना सकते थे, बनाये। यहां यह उल्लेखनीय है कि श्री दौलत राम सैनी, जिन्होने सहकारी विभाग के निरीक्षण एवं मैनेजर दोनो पद संभाल रखे थे उन्होने राजस्थान से ग्रेजूएशन करने के उपरान्त इग्लैण्ड से एफआरसीएस भी पास किया था। उन्होने लाहौर स्नातक होने के उपरान्त एफआरसीएस पास किया था। कालान्तर के निरीक्षण क पद के स्थान पर सहायक रजिस्ट्रार का पद हो गया तथा इस पद पर श्री सुखदयाल गुप्ता को लगा दिया गया। बैंक का कार्यालय कचहरी मे ही एक कमरे मे था जो सरकार ने बैंक को बिना किसी किराये के दे रखा था। कर्मचारियों मे मैनेजर के अतिरिक्त केवल एक और कर्मचारी थे जो क्लर्क कम कैशियर कम एकाउंटैंट थे और सब प्रकार का कार्य सम्पन्न करते थे।

  • सर्वप्रथम बैंक के निजी फण्ड से बैंक का कार्य चलाना संभव न था, अतः बीकानेर सरकार ने मु0 45000रू. का ऋण बैंक को दिया था। जिनमे से बैंक ने प्रथम वर्ष 30,000रू. प्राप्तs किये थे। सरकार का पूरा ऋण बैंक ने धीरे-धीरे चुकता कर दिया।

    प्रथम वर्ष में 46 समितियां एवं 608 व्यक्तिगत कुल 654 सदस्य बने और इस वर्ष 6 प्रतिशत की दर से सदस्यों को लाभांश दिया गया। उस समय समितियों को 9 प्रतिशत की दर से ऋण दिये जाते थे।

  • बैंक शनैः शनैः प्रगति के पथ पर सफलता के साथ अग्रसर होता गया। परन्तु इसकी उन्नति इतनी संतोषजनक न हुई क्योंकि सहकारिता को जन-जन तक पहुंचाने एवं इसके प्रचार-प्रसार के सम्बन्ध में कोई योजनाबद्ध कार्यक्रम नहीं बन पाया। परिणाम स्वरूप् सन् 1940 तक बैंक के कार्य संचालन की प्रगति नगण्य ही रही। जैसा कि निम्न आंकड़ों से स्पष्ट हैः

    1940 की स्थिति-

    • सदस्य संख्या - 710
    • हिस्सा पूंजी - 27600.00
    • अमानतें - 64400.00
    • कार्यशील पूंजी - 154700.00
    • समितियों को ऋण - 122100.00
    • शुद्ध लाभ - 1850.00

  • सन् 1950 तक भी बैंक ने कोई विशेष उन्नति नहीं की परन्तु इतना अवश्य था कि बैंक ने किसी भी वर्ष हानि नहीं दिखाई। इन वर्षों में 3 प्रतिशत से लेकर 9 प्रतिशत तक सदस्यों को लाभांश दिया गया। तीन प्रतिशत केवल एक वर्ष में ही दिया गया, जिस वर्ष देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान की स्थापना हुई। बैंक के मुसलमान सदस्य तथा ऋणी पाकिस्तान चले गये थे।

  • सन् 1952 का वर्ष बैंक के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। 1952 में बैंक ने सरकार से लिया हुआ कमरा, जिसमें बैंक का कार्यालय था सरकार को वापिस कर दिया और स्वावलम्बन की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए अपने स्तर पर नगरपालिका भवन में दो कमरे किराये पर ले लिये और वहीं से बैंक की गतिविधियों का संचालन प्रारम्भ कर दिया।

    1952 में ही एक और सकारात्मक अध्याय बैंक के पक्ष में जुड़ गया जिसनें बैंक का एवं राजस्थान में पूरी सहकारिता का कायाकल्प कर दिया। राजस्थान में एवं गंगानगर जिले में सहकारिता की धीमी प्रगति पर राज्य सरकार अन्य कुछ राष्ट्रीय नेताओं तथा अर्थशास्त्रियों व समाजसेवियों को चिंता हुई एवं उन्होंने सहकारिता आन्दोलन में अधिक गति व उन्नति लाने हेतु निरन्तर विचार किया। इनका सतत् प्रयास रंग लाया एवं 1952 में राजस्थान स्टेट कॉ-आपरेटिव बैंक के नाम से जयपुर में एक शीर्ष सहकारी संस्था की स्थापना की गई। इस बैंक के प्रारम्भ के साथ ही अपने कृषक सदस्यों की आवश्यकताओं के अनुरूप् सस्ती ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध होने लगा। 1952 से बैंक के कार्य में आशातीत वृद्धि होने लगी, जिसके फलस्वरूप् बैंक के संचालक मंडल ने 1954 में मु. 45000.00 रूपये की लागत से बैंक के निजी भवन का निर्माण करवाया। वास्तव में यह एक ऐसा मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने पूरे राजस्थान में हमारे बैंक को शिखर पर ला खड़ा किया जो हम सबके लिए आज भी गर्व का विषय है। बैंक भवन का उद्घाटन तत्कालीन सहकारिता मंत्री श्री अमृतलाल यादव द्वारा किया गया।

  • सन् 1957 में रजिस्ट्रार सहकारी समितियां, जयपुर से एक पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें उन्होंने श्रीगंगानगर जिले में एक शाखा खोलने का निर्देश दिया। संचालक मंडल द्वारा एक जुलाई 1958 को रायसिंहनगर में बैंक की पहली शाखा की स्थापना की गई। जिसमें मुख्य कार्यालय श्रीगंगानगर से श्री वी.पी. सेठी को ब्रांच मैनेजर के पद पर नियुक्त किया गया। इस शाखा के खोलने से रायसिंहनगर, सूरतगढ़ और अनूपगढ़ तहसीलों की समितियों का प्रत्यक्ष रूप से इस शाखा से सम्बन्ध जुड़ गया। इसके उपरान्त आवश्यकतानुसार जिले में शाखाओं को खोला जाना प्रारम्भ हो गया और आज इस बैंक की कुल 24 शाखायें सक्षम इकाई के रूप में सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं।

  • दिनांक 26 सितम्बर 1959 तक बैंक के अध्यक्ष जिलाधीश महोदय पदेन होते थे। परन्तु बैंक ने अपनी साधारण सभा दिनांक 23 फरवरी 1958 में नए उपनियम अपना लिए जिसके अनुसार बैंक का नाम ‘दी सैंट्रल को-आपरेटिव मॉर्टगेज् बैंक लि.‘ के स्थान पर दी गंगानगर केन्द्रीय सहकारी बैंक लि., श्रीगंगानगर किया गया। अध्यक्ष पदेन के स्थान पर नॉन ऑफिशियल मैमबरान में से ही चुना जाना स्वीकार किया गया। अतः दिनांक 26.09.1959 को बैंक के अध्यक्ष चौधरी मोती राम सहारण पूर्व एम.एल.ए. चुन लिए गए। नए उपनियमों के अनुसार संचालक मंडल के कुल 12 सदस्य थे। जिनमें से छः समितियों के प्रतिनिधि, तीन व्यक्तिगत सदस्यों में से और तीन रजिस्ट्रार द्वारा मनोनीत किए जाते थे। इसके पहले वाले संचालक मंडल में कोई भी सदस्य मनोनीत नहीं होता था। उल्लेखनीय है कि 1952 के पश्चात् प्रत्येक क्षेत्र में बैंक प्रगति की ओर अग्रसर होने लगा।

  • सन् 1970 में हम केवल अपनी ही छः शाखाओं पर ड्राफ्ट जारी कर सकते थे। परन्तु बैंक को मिच्युअल अरेंजमेंट स्कीम का सदस्य बनाये जाने के उपरान्त हमने राजस्थान के 190 बड़े नगरों पर ड्राफ्ट जारी करने प्रारम्भ कर दिये एवं इन स्टेशनों से जारी किये हुए ड्राफ्टों को हम भुगतान भी करने लगे।

    ऑल इण्डिया मिच्युअल अरेंजमेंट स्कीम - इसी क्रम में बैंक की तीन शाखायें ऑल इण्डिया मिच्युअल अरेंजमेंट स्कीम के अन्तर्गत पूरे भारत में ड्राफ्ट जारी करने लगीं।

  • बैंक आज 300 से अधिक ग्राम सेवा सहकारी समितियों को उनकी वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहा है। वर्ष 1990 में बैंक ने ग्राम सेवा सहकारी समितियों के सदस्यों को सीधे बैंक से ऋण उपलब्ध करवाने की नई ऋण पद्धति लागू की। जिसके तहत ऋण लेने वाले सदस्य का परिचय पत्र, पास बुक पूरे विवरण व प्रमाणित फोटो सहित तैयार कर उनको चैक बुक उपलब्ध करवाई जाने लगी। जिससे वह स्वयं चैक जारी कर अपने आप बैंक से ऋण प्राप्त करने लगा। इनसे सदस्य अनावश्यक परेशानी एवं विलम्ब से बच गये। इस सुविधा के साथ-साथ समिति के धन के दुरूपयोग करने के मामलों पर भी अंकुश लग गया। इस पद्धति को राज्य स्तर पर खूब सराहा गया तथा इसे 1990 के बाद सहकारी विभाग द्वारा राजस्थान के अन्य सभी बैंकों में भी लागू कर दिया गया। यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि इस पद्धति को पूरे राज्य में गंगानगर पैटर्न के नाम से जाना जाने लगा। इससे गंगानगर एवं हमारे बैंक दोनों की पूरे राजस्थान में अलग पहचान एवं प्रतिष्ठा बढ़ी।

  • ग्राम सेवा सहकारी समितियां केवल ऋण देने का माध्यम ही नहीं बल्कि उन्हें छोटे बैंकों के रूप में भी काम करने हेतु मिनी बैंक के नाम से तैयार किया गया। परिणामस्वरूप सहकारी समितियों में मिनी बैंक सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं।

  • वर्ष 2001-02 में महिला शक्ति को संगठित करने की दृष्टि से 302 महिला सहकारी समितियां जिनकी सदस्य संख्या 15687 थी, का भी गठन कर इन्हें वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।

  • बैंक के कार्य कृषि ऋणों तक ही सीमित न रहें, बल्कि व्यापारित गतिविधियों में भी आगे आने के उद्देश्य से सन् 1990 से व्यापारियों को उनकी साख सीमा का निर्धारण कर ऋण दिये जाने लगे। इसके साथ-साथ उपभोक्ता, ट्रैक्टर, वाहन, उद्योग, होटल, डेयरी, सिंचाई, ईंट-भट्ठा, भवन निर्माण, शिक्षा, मछली पालन आदि गतिविधियों हेतु भी ऋण देना प्रारम्भ करने से यह बैंक व्यापारित बैंकों से भी प्रतिस्पर्धा में आ गया।

  • ऋण वितरण, ऋण वसूली, अमानतों व अन्य जो भी लक्ष्य शीर्ष बैंक या राज्य सहकारी विभाग द्वारा प्रति वर्ष पूरे राज्य के बैंकों हेतु आवंटन किये जाते हैं, उनमें अन्य बैंकों द्वारा लक्ष्य पूरा करने में असमर्थता दिखाई जाने के कारण उनके लक्ष्यों को पूर्ण करने का दायित्व भी इसी बैंक को दे दिया जाता है तथा इस बैंक के कार्यकर्ता उन्हें भी पूरा कर देते हैं। यह एक ऐसा कार्य है जो बैंक व इसके स्टॉफ की कार्यक्षमता एवं कार्यनिष्ठ का द्योतक है।

  • बैंक द्वारा ग्राम सेवा सहकारी समितियो को सक्षम बनाने एवं लाभ में लाने हेतु विभिन्न योजनाओं की क्रियान्विति की जाती है। जैसे उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री एवं कृषि यंत्रीकरण किराया योजना आदि।

  • बैंक का ऑडिट सहकारी विभाग द्वारा नियुक्त ऑडिटर द्वारा किया जाता है। यह संतोष का विषय है कि ऑडिटर द्वारा इस बैंक को निरन्तर ‘अ‘ श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता रहा है। यह वर्गीकरण पूरे राज्य में हमारे बैंक की सुदृढ़ वित्तीय स्थिति का परिचायक है।

  • बैंक द्वारा पूर्ण किये जाने वाले शत-प्रतिशत लक्ष्यों व बैंक की अन्य गतिविधियों की समीक्षा राज्य स्तर पर ही नहीं भारत के अन्य बैंकों से भी की जा कर इस बैंक को तीन बार वर्ष 1995ध्796, 1998-99 तथा 2000-01 में राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ अवार्ड से नवाजा गया है। जिसके अन्तर्गत कुल 13 लाख रूपये नकद व शील्ड़ें भारत सरकार के वित्त मंत्री द्वारा प्रदान किये गये हैं। यह सम्मान क्षेत्र के सभी लोगों के लिए अतिशय गर्व का विषय है। पुरस्कार में प्राप्त राशि से बैंक द्वारा शिक्षा प्रोत्साहन कोष का निर्माण कर स्टाफ के मेधावी बच्चों को नकद राशि प्रदान कर प्रोत्साहित करने की योजना लागू की गई। इस योजना के अन्तर्गत गत वर्षों से पुरस्कृत किये बच्चों का विवरण निम्न प्र्रकार है:-
    वर्ष प्रोत्साहित बच्चे प्रोत्साहन राशि
    1998-1999 22 7600
    1999-2000 62 31200
    2000-2001 65 31400
    2001-2002 81 55000
    2002-2003 82 52800
    2003-2004 62 116000

  • इसके साथ-साथ उत्कृष्ट कार्यकलापों के आधार पर बैंक को राज्य स्तर पर अनेकों बार सम्मानित किया गया है।

पूरे बैंक के इतिहास को सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर उजागर होता है कि बैंक ने जिस प्रकार उन्नति के रिकार्ड स्थापित कर पूरे भारत वर्ष में अपनी पहचान बनाई है और बुलन्दियों को छूआ है, वास्तव में वह एक अपवाद ही है और यह उपलब्धि बैंक के संचालक मण्डलों एवं प्रशासकों द्वारा सही समय पर सही निर्णय लेना, सहकारी विभाग, रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया, नाबार्ड एवं शीर्ष सहकारी बैंक द्वारा सही दिशा-निर्देश व मार्गदर्शन देना तथा बैंक के कर्मचारियों एवं अधिकारी वर्ग द्वारा कड़ी मेहनत व कार्यनिष्ठा से अपने कर्त्तव्य निर्वाह करने का ही प्रतिफल कहा जा सकता है।